TET Relaxation For Primary Teachers: देश भर के लाखों शिक्षकों के लिए एक अहम खबर सामने आई है। शिक्षा मंत्रालय ने लोकसभा में स्पष्ट कर दिया है कि प्राथमिक शिक्षक बनने के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी TET पास करना अनिवार्य है। खासतौर पर 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों के लिए यह मुद्दा काफी संवेदनशील बन गया है क्योंकि उस समय टीईटी की अनिवार्यता नहीं थी। संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई और सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि आरटीई कानून के तहत बनाए गए नियमों का पालन करना सभी राज्यों के लिए जरूरी है। इस फैसले से पुराने शिक्षकों पर टीईटी पास करने का दबाव और भी बढ़ गया है।
TET की अनिवार्यता क्या है और क्या बदलाव हुआ है
शिक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक जवाब में साफ किया है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा 23 अगस्त 2010 को जारी गजट नोटिफिकेशन के अनुसार कक्षा पहली से आठवीं तक के शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना आवश्यक है। यह प्रावधान आरटीई एक्ट 2009 की धारा 23 के अंतर्गत लागू किया गया था। हाल ही में संसद में यह सवाल उठाया गया कि जो शिक्षक 2011 से पहले नियुक्त हुए थे उन्हें टीईटी से छूट मिलनी चाहिए क्योंकि उनकी भर्ती उस समय के नियमों के अनुसार हुई थी जब यह परीक्षा अनिवार्य नहीं थी। लेकिन सरकार ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि वर्तमान नियमों का पालन करना सभी के लिए जरूरी है।
TET नियम से जुड़ी मुख्य बातें
शिक्षा मंत्रालय ने अपने जवाब में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं। सबसे पहली बात यह है कि टीईटी केवल नई भर्तियों के लिए ही नहीं बल्कि पदोन्नति के लिए भी आवश्यक योग्यता मानी जाती है। दूसरी अहम बात यह है कि यह नियम पूरे देश में समान रूप से लागू है और किसी भी राज्य को इसमें छूट देने का अधिकार नहीं है। तीसरी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में टीईटी को शिक्षक योग्यता का अनिवार्य हिस्सा माना है। चौथी बात यह है कि जिन शिक्षकों की सेवा में पांच साल से अधिक समय बचा हुआ है उन्हें दो साल के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। इन नियमों का मकसद स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
TET नियम का शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था पर असर
इस नियम के लागू होने से देश भर में हजारों पुराने शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। जिन शिक्षकों ने 2011 से पहले नौकरी पाई थी वे अब दबाव में हैं कि वे टीईटी पास करें वरना उनकी पदोन्नति रुक सकती है। कुछ मामलों में तो नौकरी पर भी खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ यह नियम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में मददगार माना जा रहा है क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि हर शिक्षक के पास न्यूनतम योग्यता और कौशल है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि अनुभवी शिक्षकों को परीक्षा में बैठने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है क्योंकि उनका अनुभव खुद ही उनकी योग्यता का प्रमाण है। फिर भी सरकार का रुख अभी तक सख्त बना हुआ है।
TET की खास बातें
टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट की कुछ विशेषताएं इसे अन्य परीक्षाओं से अलग बनाती हैं। यह परीक्षा दो स्तरों पर आयोजित की जाती है – पेपर वन कक्षा पहली से पांचवीं के शिक्षकों के लिए और पेपर टू कक्षा छठी से आठवीं के शिक्षकों के लिए होता है। इस परीक्षा की वैधता सात साल तक मानी जाती है जिसके बाद इसे दोबारा देना पड़ सकता है। परीक्षा में बाल विकास और शिक्षाशास्त्र, भाषा कौशल, गणित और पर्यावरण अध्ययन जैसे विषय शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए सही तरीके और ज्ञान से लैस हैं या नहीं। सबसे खास बात यह है कि यह परीक्षा केंद्रीय स्तर पर सीबीएसई द्वारा और राज्य स्तर पर संबंधित राज्य शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित की जाती है।
TET नियम का उद्देश्य और मकसद
सरकार ने टीईटी को अनिवार्य बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चित करना बताया है। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि हर बच्चे को प्रशिक्षित और योग्य शिक्षक मिलना चाहिए जो आधुनिक शिक्षण विधियों से परिचित हो। टीईटी के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि शिक्षक न केवल विषय ज्ञान में बल्कि बाल मनोविज्ञान और शिक्षण कौशल में भी दक्ष हों। इस परीक्षा का एक और महत्वपूर्ण मकसद शिक्षकों को समय-समय पर अपडेट रखना भी है ताकि वे बदलते शैक्षिक परिदृश्य के साथ तालमेल बिठा सकें। सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप है और भविष्य में भारत को शिक्षा के क्षेत्र में आगे ले जाने में मदद करेगा।
